लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में अराजकता? कलेक्ट्रेट घेराव के दौरान पुलिस व पत्रकार घायल, सवालों के घेरे में कांग्रेस का प्रदर्शन



 विजय कुमार (bajmc)

कांग्रेस पार्टी द्वारा कल कलेक्ट्रेट का घेराव मनरेगा बचाओ संग्राम और किसानों की शत-प्रतिशत धान खरीदी की मांग को लेकर किया गया था। प्रदर्शन का उद्देश्य भले ही जनहित से जुड़ा हो, लेकिन जिस तरह से यह आंदोलन उग्र हुआ, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस दौरान अफरा-तफरी की स्थिति बन गई, जिसमें पुलिसकर्मी और ड्यूटी पर तैनात पत्रकार गिरकर घायल हो गए। घायलों में वरिष्ठ पत्रकारों के साथ महिला पत्रकार भी शामिल हैं, जो केवल अपना कर्तव्य निभाने मौके पर मौजूद थीं।

पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होते हैं। वे न तो किसी आंदोलन का हिस्सा होते हैं और न ही किसी राजनीतिक दल के विरोधी। ऐसे में आंदोलन के दौरान पत्रकारों का घायल होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है।


सवाल यह उठता है कि क्या जनहित की लड़ाई में हिंसा, अव्यवस्था और अवरोध का रास्ता अपनाना सही है?

क्या लोकतंत्र में अपनी बात रखने के लिए दूसरों की सुरक्षा को जोखिम में डालना जायज़ है?

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि

आंदोलन की ताकत संख्या में नहीं, बल्कि उसके अनुशासन और नैतिकता में होती है।

कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल से यह अपेक्षा की जाती है कि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करते हुए शांतिपूर्ण आंदोलन करे, ताकि आम जनता के साथ-साथ मीडिया और प्रशासनिक अमला भी सुरक्षित रह सके।

इस घटना में घायल हुए सभी पत्रकारों और पुलिसकर्मियों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना के साथ यह भी ज़रूरी है कि भविष्य में ऐसे आंदोलनों के दौरान संयम और जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी जाए।