संसार के कई हिस्सों में इन दिनों भंयकर युद्ध का माहौल बना हुआ है, जबकि भारत में माहौल राममय दिखाई दे रहा है! इसका मतलब यह नहीं है कि जमीनी धरातल में तमाम बुनियादी मुद्दे जो ज़मीन पर भरे पड़े हुए देखे जाते है वह दिखाई देना बंद हो गया है।
जमीन पर बुनियादी मुद्दा आज भी ज्यों का त्यों बना हुआ है जिसमें तमाम तरह की कई महत्वपूर्ण जरूरतें शामिल है! मंहगाई,बेरोजगारी,भ्रष्टाचार,शिक्षा स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, पानी,कारोबार, धंधा जैसे कई और अन्य मुद्दा शामिल है! बावजूद इसके अयोध्या में भगवान श्री राम चंद्र जी को लेकर जो माहौल बनाई जा रही है! उस माहौल में सरकार की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि भगवान श्री राम चंद्र जी हिन्दू आस्था के प्रतीक माने जाते हैं ! चूंकि भारत हिन्दू राष्ट्र के तौर पर काफी आगे निकलने की फिराक में इन दिनों दिखाई दे रही है।
जमीन पर बुनियादी मुद्दा आज भी ज्यों का त्यों बना हुआ है जिसमें तमाम तरह की कई महत्वपूर्ण जरूरतें शामिल है! मंहगाई,बेरोजगारी,भ्रष्टाचार,शिक्षा स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, पानी,कारोबार, धंधा जैसे कई और अन्य मुद्दा शामिल है! बावजूद इसके अयोध्या में भगवान श्री राम चंद्र जी को लेकर जो माहौल बनाई जा रही है! उस माहौल में सरकार की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि भगवान श्री राम चंद्र जी हिन्दू आस्था के प्रतीक माने जाते हैं ! चूंकि भारत हिन्दू राष्ट्र के तौर पर काफी आगे निकलने की फिराक में इन दिनों दिखाई दे रही है।ऐसे में भारतीय नागरिकों को यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि भारत की पहचान भारत के नागरिक हैं न कि किसी की जाती व धर्म !
धर्मनिरपेक्षता एक पॉलीटिकल टर्म है..
इंडिविजुअल नही। भारत का सम्विधान किसी नागरिक को धर्मनिरपेक्ष होने का आदेश या उपदेश नही देता।
●●आम धारणा बनाई गई है कि धर्मनिरपेक्षता मात्र हिन्दुओ पर थोप दी गयी है। मुसलमानों को खुली छूट मिल रखी है।
जो लोग ऐसे व्हाट्सप फार्वर्ड की मदद से, कॉन्स्टिट्यूशन में पीएचडी करते आये हैं, उनके लिए यह समझना जरूरी है। ●●सर्वप्रथम यह- कि सम्विधान मुख्यतः, "गर्वमेन्ट" के लिए निर्देशावली है।
"सरकार" क्या करे, क्या न करे।
करे, तो किस तरह से, किन दायरों, प्रक्रियाओं के तहत करे।
42 वे सम्विधान संशोधन में आर्टिकल 51A के तहत, मूल कर्तव्य जोड़े गए । सिर्फ यही एक हिस्सा है, जिसमे नागरिक से भी कुछ अपेक्षायें की गई है।
पर ये भी सुझावात्मक है, कोई न्यायालय इन्हें जबरन पालन नही करा सकता। इस भाग के अलावे शत प्रतिशत सम्विधान, सरकार को ही निर्देश देता है..,
न कि नागरिक को। तो इसका मतलब, कि धर्मनिरपेक्ष, देश की व्यवस्था को, इसकी सरकार को होना है।
●●सरकार को किसी धर्म को फेवर नही करना है, डिसफेवर नही करना है। मूलतः तो सरकार का काम व्यापार है, हमारी नौकरी है, चाकरी है।
याने टैक्स लेना है, सेवा देनी है- सुरक्षा, आजादी, फैसिलिटीज, समाधान ..
उसे सबसे टैक्स लेना है,
सबको सेवा देनी है।
●●तो सरकार मन्दिर नही बनवा सकती। तीर्थाटन नही करा सकती। वो मस्जिद भी नही बनवा सकती, हज भी नही करा सकती।
हां, वह श्मशान और कब्रिस्तान बनवा सकती है।
यह एक सेवा है।
अब जनता मन्दिर बनवाये, मस्जिद बनवाये, हज करे या बीयर पीने गोआ जाए, सम्विधान आपको रोकेगा नही, किसी खास तरीक़े से व्यवहार को बाध्य नही रोकेगा।
अनलेस किसी अन्य कानून (जैसे शराबबन्दी, या फसाद करना, या किसी की भूमि पर कब्जा करके मन्दिर, मकान, दुकान बनाना) का उल्लंघन न हो।
संविधान कहता है, कि सत्ता किसी भी साधना पद्धति/धर्म को भी इंसेटिवाइज नही करेगी, उसे विशेष महत्व नही देगी।
यही वो धर्मनिरपेक्षता है, जो सम्विधान मे लिखित है।
●●यहाँ आधुनिक समाजों का एक फलसफा और काम करता है।
किसी लोकतंत्र की गुणवत्ता, वहां के अल्पसंख्यको की वेल बीइंग से नापी जाती है। उन्हें अपनी मान्यताओं, रवायतों के साथ जीने की कितनी छूट है, यह दुनिया देखती है।
अल्पसंख्यक, दुनिया के सामने आपके लोकतन्त्र का थर्मामीटर है, शोकेस हैं। अमूमन शोकेस, आपके गोदाम से ज्यादा चमकाया और सजाया जाता है।
युजुअल मार्केटिंग टेक्निक..
●●यूँ तो भारत मे शोकेस की हालत, गोदाम से ज्यादा खराब है।
यह सचाई सरकारे जानती थी, इसलिए उनके हालात सुधारने को बड़ी बड़ी बातें करती थी है-
- उनका संसाधनों पर पहला हक है,
- उनकी रवायतों को कोर्ट भी न छुएगी,
- उनके संस्थानों को सपोर्ट देंगे
- उनके धर्म कल्चर के लिए ग्रांट देंगे
वगैरा, वगैरा।
ये सब महज बातें ही है, या नाम मात्र का प्रयास। क्योकि असल मे तो हमारे 96% अल्पसंख्यक, सोसायटी के निम्न तबकों में ही जी रहे हैं।
और जो उच्च है, वो अपने दम पर। सरकारी मदद से नही। ●●लेकिन मार्केटिंग जिंगल तो सबके कानो में जाता है। न जाए, तो लाउडस्पीकर से आप तक पहुचाया जाता है।
बताया जाता है कि फलां को विशेष सुविधा देने की बात हो रही है। विघ्नसंतोषी, ईर्ष्यालु लोग सुनकर चिढ़ते हैं। तब, पहले से जर्जर शोकेस को दंगाई बन तोड़ने पर उतारू हो जाते हैं।और जब इन दंगाइयों के हाथ मे सत्ता आ जाये, तो शोकेस पर सीधे बुलडोजर चलता है
●●बहरहाल, सन्देश यह, कि हमारे सम्विधान के अंतर्गत धर्मनिरपेक्षता पोलिटिकल टर्म्स में है, इंडिविजुअल नहीं।नागरिक के लिए नही।
तो किसी नागरिक को धर्मनिरपेक्ष होने की जरूरत नही है। यह जिम्मेदारी और बाध्यता, सरकार की है। आप तो आराम से, अपना धर्म मानें।
मगर सम्विधान दूसरे धर्म वालो को डिस्टर्ब करने की इजाजत नही देता। आप भी न करें। उन्हें अपनी मान्यताओं, अपने कल्चर के चश्मे से न देखें। उनको ज्ञान न ठेलें।
●●अपना ज्ञान अपने बच्चो को दें।
अपनी संस्कृति का, अपनी साधना पद्धति का, अपने धर्म का.. अपने महापुरुषों के आदर्श का..
और उन्हें बार बार बतायें, समझायें... कि उनका सबसे बड़ा धर्म, इंसान होना है।
प्रबुद्ध होना है।
बुद्ध होना है।
