कुरूद में धूमधाम से मनाया गया कमरछठ का पर्व,माताओं ने संतानों की खुशहाली के लिए रखा व्रत

कुरूद में धूमधाम से मनाया गया कमरछठ का पर्व,माताओं ने संतानों की खुशहाली के लिए रखा व्रत

मुकेश कश्यप की रिपोर्ट

कुरूद. नगर और आसपास के क्षेत्रों में आज सनातन संस्कृति और लोक आस्था का महापर्व 'कमरछठ' (हलषष्ठी) बेहद हर्षोल्लास और पारंपरिक धूमधाम के साथ मनाया गया। नगर के सभी वार्डों में सुबह से ही उत्सव और भक्ति का माहौल देखा गया, जहां माताओं ने अपनी संतानों की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना के लिए यह व्रत रखा।पर्व के अवसर पर सभी वार्डों में विशेष पूजा हुई और पूजन स्थलों पर सगरी बनाई गई थी। पूजन के समय वार्ड की महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सगरी के पास एकत्रित हुईं। माताओं ने सगरी की परिक्रमा करते हुए जल, दूध, दही और महुआ के पत्तों से विधिवत पूजा-अर्चना की। भगवान शिव और माता पार्वती की वंदना कर कथा श्रवण किया गया।इस अवसर पर बिना हल चले अनाज (पसहर चावल) और छह प्रकार की भाजियों का विशेष भोग तैयार किया गया। पूजा संपन्न होने के बाद माताओं ने पसारी चावल का भात और दूध-दही का प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत पूरा किया। नगर के विभिन्न वार्डों में सामूहिक पूजा के आयोजन से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से कमरछठ व्रत का विशेष महत्व है मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है, इसलिए इसे हलषष्ठी भी कहा जाता है। इस दिन हल से जुते हुए किसी भी अन्न या फल का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है। माताएं अपनी संतान की रक्षा, संकटों से मुक्ति और उनके उज्जवल भविष्य के लिए यह निराहार व निर्जला व्रत रखती हैं। लोक परंपरा में इसे मातृत्व के समर्पण और संतानों के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक माना जाता है।