जिला में मौजूद विधायकों के सहयोगी कार्यकर्ता( ठेकेदार) राजनीतिक लूटीया डूबाने को उतारू है।

                                                     विनोद नेताम  बालोद : राजनितिक पंडितो के मुताबिक राजनिती वह दूध है जिसे जो पीयेगा वह झूठ ही बोलेगा। इसलिए कहा जाता है कि ऐसा कोई राजनीति में सगा नहीं जिसने जनता को ठगा नहीं। यानी की राजनीति में झूठे और लबरा लबरलोर नेताओं की जबदस्त डिमांड है। इस बिच बालोद जिला की राजनीति में चुनाव का मौसम सबसे ज्यादा ठगाई, गुमराह एवं सपने दिखाने का मौसम बताया जाता है। भले ही उस समय के दौरान असल में कोई भी मौसम क्यों न चल रहा हो, लेकिन बिन मौसम राजनेता अपनी निष्ठा बदलने की वर्षा करते हैं। वंही राजनीतिक दल चुनावी वायदों के जरिये स्वर्ग को ही धरती पर उतार लाने के लिए झूठ का ओले बरसाते हैं। यह खेल हर चुनाव से पहले जिला में खेला जाता है, फिर भी मतदाता खुद को भरमाने से नहीं बचा पाते है, लिहाजा हर बार ठगा जाता है। कहने को चुनाव लोकतंत्र का महाकुंभ होता है, लेकिन इस महाकुंभ में सर्वाधिक लोकतंत्र के हनन की घटनाएं होती है, जो एक बड़ी चिन्ता का कारण है।  
छतिसगढ़ राज्य में आगे आने वाले साल के दौरान विधानसभा चुनाव संभव है। लिहाजा पूरे प्रदेश सहित जिला में मौजूद तीन विधानसभाओ में राजनिती दूध बंटने का दौर शुरू हो गया है। जिला के तीनो विधानसभाओं में मौजूद नेता राजनिती के दूध को खुद भी पी रहे है और कार्यकर्ताओ को भी पीला रहे है। ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा स्पष्ट है झूठ बोलकर ठग कर सत्ता हथियाना। अत: जिला के आम मतदाताओ को जागरूक रहने की आवश्यकता है। जिला के अंदर आज जो राजनीतिक माहौल बना हुआ प्रतीत नजर आ रहा है। जिस तरह रोज नए समीकरण बन या बिगड़ रहे हैं और जिस तरह सत्ता के खेल में आदर्शों पर आधारित सारे नियम ताक पर रखा जा रहा हैं। उसको देखते हुए किसी भी दल के किसी भी राजनेता की कथनी पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है। जिला में मौजूद तीनों विधानसभा के चुनावी महासंग्राम में जो कुछ आगे होने वाला है, जिस तरह सत्ता को केंद्र बनाकर समीकरण बनाए जा रहे हैं एवं येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने के षडयंत्र रचे जा रहे हैं। उससे जिला के समझदार तबका का चिंतित होना स्वाभाविक है। यह सही है कि मूल्य आधारित राजनीति की बात करना आज थोथा आदर्शवाद माना जाता है, लेकिन कहीं-न-कहीं तो हमें यह स्वीकारना ही होगा कि जिस तरह की अवसरवादी राजनीति हमारे लोकतंत्र पर हावी होती जा रही है, उससे जिला के वास्तविक और व्यापक हितों पर विपरीत असर ही पड़ सकता है। जिला के तीनो विधानसभाओं में हो रहे राजनीतिक तमाशे और राजनेताओं के बदलते चेहरे को जिला के मतदाताओ को समझना आसान है। राजनितिक पंडितो की माने तो एक चतूर राजनेता वह है जो राजनिती के दूध को पीने हेतू हाथी जैसे दांत का इस्तेमाल करता है। जैसा कि सभी को ज्ञात है कि हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ और होते है। ठीक वैसे ही नेताओ को भी राजनिती के दूध का सेवन करते वक्त ध्यान रखना चाहिए। खैर दूध को पीने के लिए दांतों का इस्तेमाल जरूरी नहीं है, फिर भी चुनाव जितना है अतः कोई नेता रिस्क नहीं लेना चाहता है। यदि भूल से नेताओं की सेहत झूठ बोलते वक्त बिगड़ गई तो सब गुड़ गोबर बन जायेगा। पुराने जमाने में नेता अपने जन सभाओं में कलमकारों को साथ लेकर जाते थे ताकि दूसरे दिन कलमकार उनके वाहवाही में चंद शब्द उकेर सके आजकल जिला में यह कार्य नेताओं ने ठेकेदारों को दे कर रखा हुआ है। वैसे देखा जाए तो जिला में मौजूद विधायकों के आसपास कार्यकर्ताओं के नाम पर नामचीन ठेकेदारों का लंबा पैरिस्ट मौजूद है जिनके मुख्य कार्य सरकारी निर्माण कार्यों में धांधली करना एवं विधायकों के तारिफ में झुठे कसीदे गढ़ना है। अब राजनीति के दूध को पीकर राजनीति करने वाले लोग सही तो नहीं उगल सकते है अलबत्ता झूठ ही उगलेगा। विचार करने वाली बात यह है कि इन ठेकेदारों के झूठे तारिफो से मौजूदा विधायकों को कितना लाभ मिलेगा जिसके दम पर वे आगामी विधानसभा चुनाव में भाग्य आजमाने की बाट जोह रहे हैं। लोगों की मानें तो नेता कम ठेकेदार ज्यादा ऐसे लोगों का झूंड विधायकों को आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान गहरी गढ्ढा में गिरा सकता है। चूंकि ठेकेदारों को निर्माण कार्यों में धांधली करने का गहरा अनुभव प्राप्त होता हैं अतः राजनिति के दूध पीने के बावजूद इन पर भरोसा करना मौजूदा विधायकों को भारी पड़ सकता है।